आधुनिक कृत्रिमता


कविता अब हमें नहीं सुहाती

हम बदल ग‌ए हैं

यथार्थवादी हो ग‌ए हैं

फूलों का खिलना अब हमें नहीं पता चलता

पंछियों का चहचहाना हमें नहीं सुनाई देता

भोर का सुगंधित वायु हमें तरोताजा नहीं करती

नदियों का बहना अब हमें आकर्षक नहीं लगता

बारिश की बूंदें अब हमें उल्लसित नहीं करतीं

हवायों की आवाजें हम नहीं सुन पाते

खेतों खलिहानों में लहलहाती फसलें हमारा मन नहीं मोहती

पेड़ों पर झूले अब नहीं डलते

गौरैया अब हमारे घर आंगन में नहीं फुदकती

प्रेम का रूहानी एहसास अब हमें नहीं होता

रिश्तों में निश्छलता अब नहीं दिखती

मिट्टी से वो सोंधी खुशबू अब नहीं आती

कुल्हडों में चाय अब नहीं मिलती

लोग साथ बैठकर बतकही नहीं करते

गुड का रस अब मन नहीं मोहता

लोग रुककर अब पत्तियों की कड़कड़ाहट अब नहीं सुनते

अब छप्पर के नीचे बैठकर चाय नहीं पीते

सुर्योदय पर अब लोग नहीं उठते

वाकई युग बदल गया है !

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